प्रेस विज्ञप्ति

भारत पहली बार करेगा ‘वर्ल्ड लैंडस्लाइड फोरम की मेज़बानी; 75 देशों के 1,900 लेखक हिस्सा लेंगे

नई दिल्ली, 9 अक्टूबरः भारत पहली बार ‘वर्ल्ड लैंडस्लाइड फोरम’ की मेज़बानी करने जा रहा है। इस तरह भारत इस ग्लोबल इवेंट की मेज़बानी करने वाला पांचवां देश बन जाएगा। अगले महीने फरीदाबाद में होने वाले सातवें  संस्करण में 75 से अधिक देशों और क्षेत्रों के 1,900 से अधिक लेखकों के शामिल होने की उम्मीद है।

वर्ल्ड लैंडस्लाइड फोरम 7 का आयोजन 23 से 27 नवंबर के बीच दिल्ली-एनसीआर के फरीदाबाद स्थित अमृता विश्व विद्यापीठम में किया जाएगा। इससे पहले फोरम का आयोजन टोक्यो, जापान (2008), रोम, इटली (2011), बीजिंग, चीन (2014), ल्युब्ल्याना, स्लोवेनिया (2017), क्योटो, जापान (2021) और फ्लोरेंस, इटली (2023) में किया जा चुका है।

यह पांच दिवसीय फोरम वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, प्रैक्टिशनर्स और नीति-निर्माताओं को एक मंच पर लेकर आएगा। जो लैंडस्लाइड के विज्ञान, अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम और आपदा-जोखिम कम करने के तरीकों में हुई प्रगति पर चर्चा करेंगे।

इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑन लैंडस्लाइड्स की अगुवाई में आयोजित होने वाला यह इवेंट कई संस्थाओं के सहयोग से हो रहा है, जिनमें जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी, डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट और इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन शामिल हैं।

वर्ल्ड लैंडस्लाइड फोरम को 700 से अधिक एब्स्ट्रैक्ट और फुल पेपर मिले हैं, जिनमें 75 से अधिक देशों और क्षेत्रों तथा 760 से अधिक संस्थाओं के 1,900 से अधिक लेखक शामिल हैं। उम्मीद है कि 1,280 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभागी इस कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे।

“सुरक्षित और मज़बूत समुदायों के लिए लैंडस्लाइड साइंस और प्रैक्टिस” थीम के तहत, यह फोरम लैंडस्लाइड से होने वाले आपदा-जोखिम को कम करने, रिमोट सेंसिंग, मॉनिटरिंग और अर्ली वॉर्निंग, खतरे की पहचान, जोखिम के आकलन और उसे कम करने के उपायों पर फोकस करेगा।

सम्मेलन से पहले 22 नवंबर को होने वाली  वर्कशॉप में नई तकनीकों पर फोकस किया जाएगा, जिनमें लैंडस्लाइड के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सैटेलाइट-बेस्ड मॉनिटरिंग, सेंटीनेल-1 और NISAR, InSAR, डिजिटल ट्विन्स, लैंडस्लाइड की भविष्यवाणी और जियोस्पेशियल मॉडलिंग शामिल हैं। भारत के लिए, यह फ़ोरम भूस्खलन की निगरानी और शुरुआती चेतावनी वाली तकनीकों में हुई प्रगति पर रोशनी डालेगा। साथ ही, भूस्खलन की आशंका वाले इलाकों की चुनौतियों से निपटने के लिए विश्वस्तरीय विशेषज्ञता भी उपलब्ध कराएगा।

अमृता विश्व विद्यापीठम ने बताया कि संस्थान का भूस्खलन अनुसंधान कार्यक्रम 2006 में शुरू हुआ था। इसमें ज़मीन के अंदर की हलचल को भांपने वाली तकनीक (डीप-अर्थ सेंसिंग), इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स (आईओटी) नेटवर्क, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग को बुनियादी पर लागू करने और समुदाय-आधारित जोखिम संचार के साथ जोड़ा गया है।

यूनिवर्सिटी ने केरल के मुन्नार में भूस्खलन का पता लगाने और शुरुआती चेतावनी देने के लिए वायरलेस सेंसर नेटवर्क लगाए हैं और एआई-इंटीग्रेटेड आईओटी सिस्टम भ्ठाी विकसित किया है। बाद में भारत सरकार के अनुरोध पर सिक्किम में भी ऐसा ही सिस्टम लगाया गया था।

यूनिवर्सिटी के अनुसार, इस कार्यक्रम की निगरानी और शुरुआती चेतावनी के काम में 300 से ज़्यादा सेंसर जुड़े हुए हैं, और शोधकर्ताओं ने देशभर में भूस्खलन वाले 70 से अधिक इलाकों का दौरा किया है।

इस अवसर पर अमृता विश्व विद्यापीठम की प्रो-वाइस चांसलर और अमृता सेंटर फ़ॉर वायरलेस नेटवर्क्स एंड एप्लीकेशन्स की डायरेक्टर डॉ. मनीषा वी. रमेश ने कहा, “भूस्खलन विज्ञान में हर प्रगति का मकसद आखिरकार किसी की जान, घर या रोज़ी-रोटी की सुरक्षा करना होना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि भारत में इस फ़ोरम के आयोजन से शोधकर्ताओं, सरकारों, इंडस्ट्री, एनजीो और समुदायों को एक-दूसरे से जुड़ने, जानकारी साझा करने और भूस्खलन के जोखिम को कम करने में मदद मिलेगी।

भूस्खलन- समुदायों और ज़रूरी बुनियादी ढांचों, जैसे सड़कों, रेलवे, बस्तियों और बिजली के बुनियादी ढांचे के लिए खतरा पैदा करता है। आयोजकों ने कहा कि यह फ़ोरम भूस्खलन के जोखिम को कम करने और उससे निपटने की क्षमता बढ़ाने के व्यावहारिक तरीकों को बढ़ावा देगा।

अमृता के भूस्खलन अनुसंधान कार्यक्रम को इंटरनेशनल प्रोग्राम ऑन लैंडस्लाइड्स के तहत लगातार तीन अवधियों -2017-2020, 2020-2023 और 2023-2026 – के लिए ‘वर्ल्ड सेंटर ऑफ एक्सीलेन्स ऑन लैण्डस्लाइड डिज़ाइस्टर रिडक्शन’ के रूप में मान्यता दी गई है।